13/06/2014

दादी माँ बनाती थी रोटी/ Dadi Maa Banati Thi Roti

Jo Mile Usmain, Kaat Lenge Hum,
Thodi Khushiyaan, Thode Aanson Baant Lenge Hum-
Lyrics of "Muskurane Ki Vajah Tum Ho"

Movie City Lights (Must Watch)
I don't know who the author is. Who so ever is written this, its so true. And the hangover of the movie CityLights make me love this poem even more.

दादी माँ बनाती थी रोटी,
पहली गाय की ,
आखरी कुत्ते की
एक बामणी दादी की


एक मेथरानी बाई
हर सुबह सांड आ जाता था
दरवाज़े पर गुड़ की डली के लिए
कबूतर का चुग्गा

किडियो का आटा ग्यारस, 
अमावस, पूर्णिमा का सीधा
डाकौत का तेल
काली कुतिया के ब्याने पर तेल गुड़ का सीरा

सब कुछ निकल आता था
उस घर से ,
जिसमें विलासिता के नाम पर
एक टेबल पंखा था...


आज सामान से भरे घर में
कुछ भी नहीं निकलता
सिवाय लड़ने की कर्कश आवाजों के.......

मकान चाहे कच्चे थे
लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे...
चारपाई पर बैठते थे
पास पास रहते थे...

सोफे और डबल बेड आ गए
दूरियां हमारी बढा गए....
छतों पर अब न सोते हैं
बात बतंगड अब न होते हैं..

आंगन में वृक्ष थे
सांझे सुख दुख थे...
दरवाजा खुला रहता था
राही भी आ बैठता था...

कौवे भी कांवते थे
मेहमान आते जाते थे...
इक साइकिल ही पास था
फिर भी मेल जोल था...

रिश्ते निभाते थे
रूठते मनाते थे...
पैसा चाहे कम था
माथे पे ना गम था...

मकान चाहे कच्चे थे
रिश्ते सारे सच्चे थे...
अब शायद कुछ पा लिया है
पर लगता है कि बहुत कुछ गंवा दिया...

Image Courtesy : Flickr.com

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7 comments:

  1. bahut hi sundar rachnaa...bahut dhondhne ka prayas kiya ki kisne likha hai, par pata nahi chal paya...do let me know if you gt to know about the poet.....I am a keen follower of your blog posts :-)

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    1. Sahi main who so ever has written, i loved it. Though i have never lived in a village but i have seen my papa and dadi telling me such stories.

      आंगन में वृक्ष थे
      सांझे सुख दुख थे...
      दरवाजा खुला रहता था
      राही भी आ बैठता था...

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    2. my own attempt at describing my village life:

      मैंने गाँव में हरियाली देखी थी...
      सुरमई शाम, और खुशहाली देखी थी...
      लोग एक-दूसरे से गले मिलते थे...
      मैने वो दिवाली और वो होली देखी थी...

      चिड़ियों का कलरव और गायों का रम्भाना देखा था...
      कंधे पर बैठे बच्चों का खेतों में जाना देखा था...
      उन छोटी छोटी खुशियों में लोगों का समाना देखा था...
      वो ओस से भीगी धरती पर सूरज कि किरने अच्छी थी.....मैंने गाँव में.......!!

      But its not same anymore, things have changed (not necessarily for bad) and slowly-2 its becoming more materialistic.

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    3. Vaah kya baat hai. Grameen jeevan ko jevant kar diya.

      I think we small town people, atleast i am, have one foot on our dreams and another in our native. To strike a balance, at some point, will have to do something .

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  2. Author of this poem is Mr Ashwani sharma.

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    1. Thanks a lot Rekha for sharing this information and dropping in at our blog.

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  3. Can anybody kindly translate this to English please?

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